हरिद्वार आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए हर की पौड़ी की यात्रा सिर्फ गंगा स्नान तक सीमित नहीं होती थी। शिवसेतु के पास बैठा एक बुजुर्ग चेहरा और उसकी आत्मीय पुकार भी इस यात्रा की यादों का हिस्सा बन जाती थी। अब वह आवाज हमेशा के लिए थम गई है। जरूरतमंदों के लिए भोजन जुटाने वाले रमाशंकर गुप्ता (Ramashankar Gupta) का निधन हो गया है। उनके जाने से हरिद्वार ने अपनी एक ऐसी पहचान खो दी है, जिसे शायद आसानी से भुलाया नहीं जा सकेगा।
रमाशंकर गुप्ता किसी संस्था या बड़े संगठन से जुड़े नहीं थे। उन्होंने वर्षों तक अकेले ही लोगों को भोजन कराने का अभियान चलाया। हर दिन वे हर की पौड़ी के पास बैठते और आने वाले श्रद्धालुओं से आग्रह करते कि अगर संभव हो तो कुछ गरीबों के भोजन का खर्च उठा दें। उनकी अपील में न दिखावा था और न ही किसी तरह का दबाव। यही वजह थी कि लोग सहज ही उनकी बात मान लेते थे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कभी अपने लिए मदद नहीं मांगते थे। जो भी सहयोग मिलता, उसका उपयोग जरूरतमंदों, साधु-संतों और बेसहारा लोगों को भोजन कराने में किया जाता। कई बार वे स्वयं भोजन तैयार करवाते और अपने सामने लोगों को सम्मान के साथ खिलाते थे। उनके लिए भंडारा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम था।
बताया जाता है कि रमाशंकर गुप्ता मूल रूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के रहने वाले थे। हालांकि जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने हरिद्वार में बिताया और वहीं सेवा कार्यों के कारण लोगों के बीच “भंडारा किंग बाबा” के नाम से प्रसिद्ध हो गए। स्थानीय दुकानदारों से लेकर नियमित रूप से आने वाले श्रद्धालु तक उन्हें नाम से पहचानते थे।
उनके निधन के बाद सबसे ज्यादा चिंता उन लोगों को है, जिनका रोज का भोजन श्रद्धालुओं के सहयोग से होने वाले भंडारे पर निर्भर रहता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि रमाशंकर गुप्ता के कारण हर दिन कई जरूरतमंदों का पेट भरता था। अब उनके जाने के बाद यह सिलसिला कैसे जारी रहेगा, इसे लेकर चिंता बनी हुई है।
हरिद्वार में कई चेहरे आते-जाते रहते हैं, लेकिन कुछ लोग अपनी पहचान सेवा से बनाते हैं। रमाशंकर गुप्ता भी उन्हीं लोगों में शामिल थे। उन्होंने बिना किसी प्रचार या पहचान की इच्छा के वर्षों तक समाज सेवा की और लोगों को यह संदेश दिया कि छोटी-सी मदद भी किसी भूखे इंसान के लिए बड़ी राहत बन सकती है।
अब शिवसेतु से गुजरने वाले श्रद्धालुओं को वह परिचित आवाज सुनाई नहीं देगी, लेकिन गरीबों के लिए भोजन जुटाने की उनकी सोच और सेवा का भाव लोगों की यादों में लंबे समय तक जीवित रहेगा।
