सकट चौथ व्रत में पढ़ें साहूकार-साहूकारनी की तिलकुट वाली कहानी

सकट चौथ व्रत में पढ़ें साहूकार-साहूकारनी की तिलकुट वाली कहानी

सकट चौथ (Sakat Chauth) व्रत माताओं के लिए बेहद खास होता है। ऐसी मान्यता है कि जो महिलाएं ये व्रत रखती हैं उनकी संतान को लंबी आयु और सुखी जीवन की प्राप्ति होती है। ज्यादातर महिलाएं इस व्रत को निर्जला रहती हैं यानी इस दिन अन्न और जल कुछ भी ग्रहण नहीं करती हैं। शाम में शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा की जाती है और साथ ही सकट चौथ की कथा सुनी जाती है। फिर रात में चंद्र देव की पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। चलिए आपको बताते हैं सकट चौथ (Sakat Chauth) की व्रत कथा क्या है।
सकट चौथ (Sakat Chauth) व्रत कथा
सकट चौथ (Sakat Chauth) की कथा अनुसार एक नगर में साहूकार और साहूकारनी रहते थे। उनका धर्म-कर्म के कार्यों में बिल्कुल भी मन नहीं लगता था। इसके कारण उनकी कोई संतान भी नहीं थी। एक दिन साहूकारनी किसी कारण से पड़ोसी के घर गयी। उसने देखा पड़ोसन सकट चौथ की पूजा करके कहानी सुना रही थी।
साहूकारनी ने पड़ोसन से पूछा ये तुम क्या कर रही हो? तब पड़ोसन ने कहा कि आस सकट चौथ का व्रत है जिसकी मैं कहानी सुना रही हूं। तब साहूकारनी ने पूछा कि सकट क्या होता है? तब पड़ोसन ने उसे बताया कि इस व्रत को करने से अन्न, धन, सुहाग और पुत्र सब मिलता है। साहूकारनी बोली यदि ऐसा है तो मैं सवा सेर तिलकुट करूंगी और चौथ का व्रत भी करूंगी। अगर मैं गर्भवती हो जाती हूं।
श्री गणेश भगवान की कृपया से साहूकारनी गर्भवती हो गई। इसके बाद उसकी इच्छाएं ओर भी ज्यादा बढ़ गई और वो भगवान से कहने लगी कि अगर मेरे लड़का हो जाये, तो में ढाई सेर तिलकुट करूंगी। कुछ दिन बाद उसे लड़का हो गया। इसके बाद वो बोली हे चौथ भगवान! मेरे बेटे का विवाह हो जाए बस, तो मैं सवा पांच सेर का तिलकुट करूंगी।
कुछ वर्षो बाद भगवान गणेश की कृपा से उसका विवाह भी तय हो गया। लेकिन इतने सब के बावजूद उस साहूकारनी ने तिलकुट नहीं किया जिससे चौथ देव क्रोधित हो गये और उन्होंने उसके बेटे को विवाह मंडप से उठाकर पीपल के पेड़ पर बिठा दिया। सभी लोग वर को खोजने लगे पर वो नहीं मिला। इधर जिस लड़की से साहूकारनी के लड़के का विवाह होने वाला था, वह अपनी सहेलियों के साथ गणगौर पूजने के लिए जंगल में दूब लेने के लिए निकली।
तभी रास्ते में उस लड़की को पीपल के पेड़ से आवाज आई: ओ मेरी अर्धब्यहि! यह सुनकर जब लड़की घर आयी तो वह धीरे-धीरे सूख कर कांटा होने लगी। एक दिन लड़की की मां ने कहा कि तू सूखती क्यों जा रही है? मैं तो तुझे अच्छा खाना खिलाती हूं, तेरा खास ख्याल रखती हूं लेकिन समझ नहीं आ रहा कि तेरा ये हाल क्यों हो गया है। तब लड़की बोली कि वह जब भी दूब लेने जंगल जाती है, तो पीपल के पेड़ से कोई आदमी बोलता है कि ओ मेरी अर्धब्यहि।
उसने अपनी माता को बताया कि उस लड़के ने मेहंदी लगा रखी है और सेहरा भी बांध रखा है। तब उसकी मां पीपल के पेड़ के पास पहुंची और उसने देखा कि ये यह तो उसका जमाई ही है। मां ने जमाई से कहा: यहां क्यों बैठे हैं? मेरी बेटी तो अर्धब्यहि कर दी। साहूकारनी का बेटा बोला मेरी मां ने चौथ का तिलकुट बोला था लेकिन नहीं किया जिसकी सजा मुझे मिल रही है।
यह सुनकर उस लड़की की मां साहूकारनी के घर गई और उससे पूछा कि तुमने सकट चौथ (Sakat Chauth) का कुछ बोला है क्या? तब साहूकारनी ने उसे सारी बात बता दी। साहूकारनी को अपनी गलती समझ आ गई और फिर उसने सच्चे मन से भगवान गणेश से कहा कि मेरा बेटा घर आजाये, तो ढाई मन का तिलकुट करूंगी। ये सुन सकट भगवान प्रसंन हो गए और उसके बेटे मंडप पर लाकर बैठा दिया। इसके बेटे का विवाह धूम-धाम से हो गया। जब साहूकारनी के बेटा-बहू घर आए तब साहूकारनी ने ढाई मन तिलकुट किया और बोली हे चौथ देवता आप के आशीर्वाद से मेरे बेटा-बहू घर आ गए हैं। अत: अब से मैं हमेशा तिलकुट करके व्रत करूंगी।
हे सकट चौथ (Sakat Chauth) भगवान जिस तरह से आपने साहूकारनी को बेटे-बहू से मिलवाया, वैसे ही हम सब को मिलवाना और इस कथा को कहने सुनने वालों का भला करना। बोलो सकट चौथ की जय। श्री गणेश देव की जय।