कार (Cars) खरीदते समय सबसे पहले जो चीज लोगों का ध्यान खींचती है, वह उसका डिजाइन है. गाड़ी कितनी खूबसूरत दिखती है, कितनी मॉडर्न लगती है और भीड़ से कितनी अलग नजर आती है. ये सभी बातें ग्राहक के फैसले पर असर डालती हैं. यही वजह है कि कार कंपनियां डिजाइन पर करोड़ों, बल्कि कई बार हजारों करोड़ रुपये तक खर्च करती हैं.
कार का डिजाइन सिर्फ बाहर की बॉडी तक सीमित नहीं होता. इसमें एक्सटीरियर, इंटीरियर, एयरोडायनामिक्स, सेफ्टी, एर्गोनॉमिक्स और मटीरियल इंजीनियरिंग सब कुछ शामिल है. एक नई कार के डिजाइन में कई साल लगते हैं. ऑटो इंडस्ट्री से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, एक बिल्कुल नए मॉडल को डिजाइन और डेवलप करने में 4 से 6 साल का समय लगता है. करोड़ों खर्च भी होते हैं. इसमें डिजाइन स्टूडियो, क्ले मॉडल, कंप्यूटर सिमुलेशन, क्रैश टेस्ट और प्रोटोटाइप पर होने वाला खर्च शामिल होता है.
डिजाइन ही ब्रांड पहचान
किसी भी कार ब्रांड (Cars Brands) की एक अलग पहचान होती है. जैसे BMW की किडनी ग्रिल, Mercedes का थ्री-पॉइंट स्टार और Tata Motors की नई डिजाइन लैंग्वेज. कंपनियां चाहती हैं कि उनकी कार को दूर से देखकर ही पहचाना जा सके. यही ब्रांड वैल्यू आगे चलकर बिक्री और मुनाफे में बदलती है.
कॉपी क्यों नहीं कर सकती कंपनियां?
बड़ा सवाल ये है कि कंपनियां कार के डिजाइन (Cars Design) करोड़ों रुपए खर्च क्यों करती हैं? क्या कोई छोटी कंपनी बड़ी कंपनी की कार को कॉपी नहीं कर सकती है? इसका सबसे बड़ा कारण है डिजाइन पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) कानून. कार के डिजाइन, बॉडी शेप, हेडलैंप, टेललैंप और कई इंटीरियर एलिमेंट्स को कानूनी सुरक्षा मिलती है. अगर कोई कंपनी किसी दूसरी कार का डिजाइन कॉपी करती है, तो उस पर भारी जुर्माना लग सकता है या कार की बिक्री तक रुक सकती है. दुनिया भर में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां डिजाइन कॉपी को लेकर कंपनियों के बीच कानूनी लड़ाई हुई है.
डिजाइन पेटेंट कराती हैं कंपनियां
कोई भी कंपनी जब कार (Cars) बनाती है तो उसका डिजाइन पेटेंट कराती है. भारत में कार का डिज़ाइन भारतीय पेटेंट कार्यालय में पेटेंट और डिज़ाइन के लिए आवेदन करके सुरक्षित किया जाता है. इसके अलावा अगर कोई कंपनी अन्य देश में कार लॉन्च करना चाहती है तो वहां भी उसे डिजाइन को पेटेंट कराना होता है.
सेफ्टी और टेक्नोलॉजी भी बड़ी वजह
आज की कारें (Cars) सिर्फ दिखने के लिए नहीं बनतीं, बल्कि उन्हें सेफ्टी नॉर्म्स पर भी खरा उतरना होता है. क्रैश सेफ्टी, पैदल यात्री सुरक्षा और एयरोडायनामिक्स इन सबका सीधा असर डिजाइन पर पड़ता है. किसी दूसरी कार की नकल करने से जरूरी नहीं कि वह डिजाइन आपकी कार के प्लेटफॉर्म और सेफ्टी स्ट्रक्चर पर फिट बैठे. इसके अलावा डिजाइन ब्रांड की पहचान, ग्राहक का भरोसा और सेफ्टी का आधार बनता है. कानूनी नियम, टेक्नोलॉजी और ब्रांड वैल्यू की वजह से कंपनियां खुलकर किसी दूसरी कार की कॉपी नहीं कर सकतीं. यही कारण है कि हर बड़ी कार कंपनी अपनी अलग डिजाइन लैंग्वेज बनाने में सालों और अरबों रुपये निवेश करती है.
डिजाइन पर खर्च होते हैं करोड़ों रुपये, क्या कॉपी कर के नहीं बना सकते दूसरी कार?
