मुख्यमंत्री सेहत योजना से स्ट्रोक मरीजों का भी मुफ्त इलाज, 914 मरीजों को मिला नया जीवन

मुख्यमंत्री सेहत योजना से स्ट्रोक मरीजों का भी मुफ्त इलाज, 914 मरीजों को मिला नया जीवन

चंडीगढ़। पंजाब सरकार की फ्लैगशिप स्वास्थ्य योजना ‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’ (Mukhyamantri Health Scheme) के तहत मस्तिष्क संबंधी आपात स्थितियों और स्ट्रोक (Stroke) उपचार से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण और आधिकारिक आंकड़े सामने आए हैं। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA), पंजाब द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यह योजना सामान्य स्ट्रोक प्रबंधन से लेकर एडवांस्ड इमेजिंग, इंटेंसिव केयर और लंबे समय तक चलने वाले उपचार तक मरीजों को संपूर्ण विधिक और वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि स्ट्रोक जैसी जानलेवा आपातकालीन स्थिति में यह स्वास्थ्य योजना गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा जीवनरक्षक सुरक्षा कवच साबित हो रही है।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, स्ट्रोक को आम बोलचाल की भाषा में ‘ब्रेन अटैक’ भी कहा जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब मस्तिष्क के किसी विशिष्ट हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या कोई ब्लड वेसल (रक्त वाहिका) अचानक फट जाती है। मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण कुछ ही मिनटों में कोशिकाएं तेजी से मरने लगती हैं, जिससे मरीज की जान जा सकती है या वह स्थायी रूप से विकलांग हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक, स्ट्रोक आज भी दुनिया भर में मृत्यु और विकलांगता के सबसे प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है, जिनमें से बड़ी संख्या ऐसे जोखिम कारकों से जुड़ी है जिन्हें समय रहते रोका जा सकता है। इसी क्रम में अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) का भी स्पष्ट कहना है कि समय पर सही चिकित्सीय उपचार मिलने से मरीज की रिकवरी में उल्लेखनीय सुधार होता है। साथ ही, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और जीवनशैली से जुड़े जोखिमों पर बेहतर नियंत्रण रखकर स्ट्रोक की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

चूंकि स्ट्रोक का न्यूरोलॉजिकल और सर्जिकल इलाज बेहद महंगा होता है, इसलिए यह बीमारी अनेक परिवारों को भारी आर्थिक संकट और कर्ज के दलदल में धकेल देती है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (एसएचए), पंजाब के पिछले छह महीनों के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत कुल 914 स्ट्रोक मरीजों का 4.15 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से पूरी तरह कैशलेस उपचार किया गया है। इन कुल मामलों में से ‘एक्यूट इस्कीमिक स्ट्रोक’ के 48 गंभीर मामले दर्ज किए गए, जिनके इलाज पर 14.27 लाख रुपये का सबसे अधिक खर्च आया। रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि एक्यूट स्ट्रोक और एक्यूट इस्कीमिक स्ट्रोक श्रेणियों में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या सबसे अधिक रही, जबकि ‘हेमरेजिक स्ट्रोक’ (रक्तस्राव वाला स्ट्रोक) के मामले तुलनात्मक रूप से कम दर्ज किए गए, लेकिन इस श्रेणी में प्रति मरीज उपचार की औसत लागत काफी अधिक रही। कुल सरकारी खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी उन्नत जांच तकनीकों तथा वेंटिलेटर सपोर्ट, ट्रेकियोस्टॉमी और रक्त चढ़ाने जैसी अतिरिक्त जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं पर व्यय हुआ।

इस कल्याणकारी रिपोर्ट पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा कि राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने का असली अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी परिवार आर्थिक तंगी या पैसों की चिंता के कारण अपने परिजन के इलाज में एक मिनट की भी देरी न करे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सेहत योजना जैसी महत्वाकांक्षी सरकारी नीतियों का मूल उद्देश्य ही यह है कि आपातकाल के समय मरीजों को तुरंत और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिले। स्वास्थ्य मंत्री ने रेखांकित किया कि स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियों में समय (समय पर इलाज) ही जीवन है, क्योंकि वहां हर एक मिनट कीमती होता है और सरकार द्वारा दी जाने वाली त्वरित वित्तीय सहायता इलाज में होने वाली देरी और किसी व्यक्ति का जीवन बचाने के बीच का सबसे बड़ा अंतर साबित हो रही है।

लुधियाना स्थित सोबती न्यूरो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल तथा मोहंदाई ओसवाल हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट न्यूरोसर्जन एवं स्पाइन सर्जन डॉ. हरमन सोबती ने इस संबंध में महत्वपूर्ण तकनीकी इनपुट साझा करते हुए कहा कि स्ट्रोक एक अत्यंत संवेदनशील मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें समय पर की गई सही जांच और सटीक इलाज ही मरीज के भविष्य और उसकी रिकवरी की दिशा तय करते हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक न्यूरो-इमेजिंग, आईसीयू में गहन निगरानी और समय पर थ्रोम्बोलिसिस (थक्का घोलने की प्रक्रिया) से अब उपचार के परिणामों में अभूतपूर्व सुधार देखा जा रहा है। डॉ. सोबती ने जनता के बीच जागरूकता की कमी पर चिंता जताते हुए कहा कि लोगों को अचानक शरीर के किसी भी एक हिस्से या हाथ-पैर में कमजोरी आना, चेहरे का एक ओर टेढ़ा या झुक जाना, और बोलने अथवा समझने में कठिनाई होने जैसे शुरुआती चेतावनी संकेतों (Warning Signs) को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और ऐसे लक्षण दिखते ही मरीज को तुरंत न्यूरो-सुविधा वाले अस्पताल ले जाना चाहिए।

डॉ. हरमन सोबती ने आगे स्पष्ट किया कि कुल उपचारित मामलों में इस्कीमिक स्ट्रोक (मस्तिष्क की नस में थक्का जमना) की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा देखी जा रही है, और आज के समय में सीटी स्कैन व एमआरआई जैसी उन्नत रेडियोलॉजिकल तकनीकें स्ट्रोक मैनेजमेंट का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि जटिल और क्रिटिकल स्ट्रोक के मामलों में निजी स्तर पर इलाज कराने से परिवारों पर असहनीय आर्थिक दबाव पड़ता है, और ऐसे संकट के समय मुख्यमंत्री सेहत योजना एक बेहद मजबूत सामाजिक सुरक्षा कवच के रूप में सामने आती है। हालांकि, उन्होंने अंत में एक डॉक्टर के रूप में यह महत्वपूर्ण सलाह भी दी कि इलाज से हमेशा रोकथाम (Prevention) ही सबसे बेहतर और प्रभावी उपाय है। लोग अपने दैनिक जीवन में ब्लड प्रेशर पर नियमित नियंत्रण रखकर, उचित डायबिटीज प्रबंधन करके, कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखकर और एक सक्रिय व स्वस्थ जीवनशैली (धूम्रपान और मोटापे से दूर) अपनाकर स्ट्रोक के जानलेवा जोखिम को काफी हद तक टाल सकते हैं।