मानवाधिकार कार्यकर्ता भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब के ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर आधारित बहुचर्चित फिल्म ‘सतलुज’ (Sutlej) पर आधिकारिक रोक और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म से इसे हटाए जाने के बावजूद राज्य में इसका विवाद और प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकारी प्रतिबंध के खिलाफ जहां एक ओर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने सड़कों पर उतरकर भारी रोष मार्च निकाला है, वहीं दूसरी ओर पंजाब के ग्रामीण अंचलों और धार्मिक स्थलों में इस फिल्म का अनौपचारिक प्रदर्शन तेजी से शुरू हो गया है। जालंधर, लुधियाना, जगरांव और पठानकोट के विभिन्न गांवों व गुरुद्वारों में बड़ी स्क्रीन लगाकर संगत को यह फिल्म दिखाई जा रही है।
गांवों और गुरुद्वारों में लाउडस्पीकर से एलान कर दिखाई जा रही फिल्म
आधिकारिक प्रतिबंध के बावजूद पंजाब की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जालंधर कैंट से सटे गांव कंगनीवाल के गुरुद्वारा साहिब में इस फिल्म का विशेष प्रदर्शन किया गया। स्थानीय निवासी हरजिंदर सिंह ने बताया कि फिल्म के प्रदर्शन से पहले बकायदा गुरुद्वारा साहिब के लाउडस्पीकर से बंगाली और आसपास के क्षेत्रों के लिए बाकायदा एलान (मुनादी) किया गया था, जिसके बाद शाम 7:00 बजे भारी संख्या में ग्रामीण व महिलाएं फिल्म देखने पहुंचे। फिल्म देखने पहुंची महिला सतवंत कौर ने भावुक होते हुए कहा कि ‘वाहेगुरु मेहर करें और पंजाब में ऐसा काला दौर फिर कभी वापस न आए।’ इसी तरह जगरांव के सलेमपुरा, सवद्दी, मानुके और काउंके कलां जैसे कई गांवों में रात के समय खुले मैदानों और चौपालों में बड़ी-बड़ी एलईडी (LED) स्क्रीन लगाकर फिल्म का सामूहिक प्रदर्शन किया जा रहा है। सलेमपुरा के कुलविंदर सिंह और काउंके कलां के हरनेक सिंह जैसे ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि सरकार द्वारा ऐतिहासिक सच पर रोक लगाना कतई उचित नहीं है, क्योंकि ऐसी फिल्में नई पीढ़ी को अपने इतिहास और वास्तविक विरासत से परिचित कराती हैं।
कत्लेआम के इतिहास और पुलिसिया जुल्म का दावा
इस अनौपचारिक प्रदर्शन का सिलसिला केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि पठानकोट में बस स्टैंड के समीप स्थित एक मुख्य गुरुद्वारा साहिब में भी बड़ी स्क्रीन पर लोगों को यह फिल्म दिखाई गई। पठानकोट निवासी कर्मजीत सिंह ने फिल्म की पृष्ठभूमि पर बात करते हुए कहा कि ‘सतलुज’ फिल्म वर्ष 1984 से लेकर 1995 तक पंजाब के कत्लेआम के कड़वे इतिहास को दर्शाती है और उस दौर में सरकार व पुलिस द्वारा किए गए कथित जुल्म को बिना किसी लाग-लपेट के बयान करती है। उधर, लुधियाना के ऐतिहासिक गांव राजोआणा खुर्द में भी फिल्म का सफल प्रदर्शन किया गया। गांव के पूर्व सरपंच निरमल सिंह गोपी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य समाज में किसी भी प्रकार की भड़काऊ स्थिति पैदा करना या युवाओं को गुमराह करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को केवल भाई जसवंत सिंह खालड़ा के मानवीय संघर्ष और उनकी शहादत की सच्चाई से अवगत कराना है।
एसजीपीसी का ऐतिहासिक रोष मार्च और अल्टीमेटम
सेंसरशिप और प्रतिबंध के विरोध में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने आज शुक्रवार को अमृतसर में एक विशाल और आक्रामक रोष मार्च निकालकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। एसजीपीसी के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी के नेतृत्व में यह मार्च ‘श्री हरमंदिर साहिब’ (स्वर्ण मंदिर) के मुख्य प्लाजा से शुरू होकर अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर (DC) कार्यालय तक पहुंचा। मार्च की समाप्ति पर सिख संस्था द्वारा पंजाब के राज्यपाल के नाम एक सख्त मांग पत्र (ज्ञापन) भी जिला प्रशासन को सौंपा गया।
एडवोकेट धामी ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि भाई जसवंत सिंह खालड़ा ने अपनी जान की परवाह किए बिना पंजाब में हजारों लावारिस और अज्ञात शवों के अमानवीय अंतिम संस्कार के कड़वे सच को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया था। मानवाधिकारों की रक्षा में उनके इस ऐतिहासिक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे महान शहीद के जीवन पर बनी फिल्म की रिलीज को रोकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और यह सीधे तौर पर सच की आवाज को दबाने का एक राजनीतिक प्रयास है। एसजीपीसी अध्यक्ष ने दोटूक शब्दों में सरकार को चेतावनी दी कि यदि इस फिल्म पर से तुरंत प्रतिबंध नहीं हटाया गया, तो कमेटी स्वयं इस फिल्म को पंजाब के गांव-गांव और घर-घर तक संगत के बीच पहुंचाने का बीड़ा उठाएगी। इसके साथ ही उन्होंने सिख संगत से आगामी 14 जुलाई को सतलुज नदी के किनारे आयोजित होने वाले विशाल ‘अरदास समागम’ में रिकॉर्ड संख्या में शामिल होने की पुरजोर अपील की है।
