नई दिल्ली। भारत सरकार ने देश के फार्मास्युटिकल उद्योग को पारंपरिक “वॉल्यूम-ड्रिवन जेनरिक उत्पादन” से आगे बढ़ाकर “वैल्यू-लेड इनोवेशन” आधारित उद्योग बनाने का लक्ष्य तय किया है। इस बदलाव के तहत अब फोकस बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर्स और आधुनिक दवा अनुसंधान पर बढ़ाया जा रहा है।
9वें संस्करण ‘इंडिया फार्मा 2026’ कार्यक्रम के मौके पर केंद्रीय राज्य मंत्री (रसायन एवं उर्वरक तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) अनुप्रिया पटेल ने कहा कि भारत का फार्मा सेक्टर वैश्विक जरूरतों और तकनीकी बदलावों के अनुरूप तेजी से खुद को ढाल रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार इस उद्योग को मजबूत बनाने के लिए नीति समर्थन और वित्तीय सहयोग प्रदान कर रही है।
मंत्री ने कहा कि बदलते वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य को देखते हुए भारत को बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के क्षेत्र में अधिक शोध और निवेश की जरूरत है। उन्होंने यह भी बताया कि दवा खोज (ड्रग डिस्कवरी) में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस परिवर्तन को गति देने के लिए सरकार ने तीन नए NIPER (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च) स्थापित करने की घोषणा की है, जिससे कुशल मानव संसाधन तैयार हो सके। साथ ही CDSCO (Central Drugs Standard Control Organisation) में संरचनात्मक सुधार किए जा रहे हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सचिव केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO से जुड़ी) पुनीया सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि बायोसिमिलर्स का विकास न केवल उपचार बल्कि रोकथाम के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि सरकार CDSCO को और मजबूत करने पर काम कर रही है ताकि बायोफार्मा क्षेत्र को बेहतर वैज्ञानिक सहयोग मिल सके।
उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में कई दवाओं के लिए टेस्ट लाइसेंस छूट जैसे सुधार किए गए हैं, जिससे रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है, जिससे अनुसंधान और विकास की प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जा सके।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार इन सुधारों और निवेश के जरिए भारत अपने पारंपरिक “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक नवाचार केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
भारत का फार्मा सेक्टर ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ से नवाचार-आधारित उद्योग बनने की दिशा में
